श्रेय लेने का स्वभाव मनुष्यगत है, किन्तु श्रेय न लेने की शक्ति व्यक्तिगत विलक्षणता है I और उससे भी आगे की पायदान है, अपने अपनों के लिए, अपने अपनों के कारण बुराई को, अपयश को भी हँसते हँसते सहन करने का साहस अपने आप में पैदा करना I

समाज में कुछ लोग ऐसे होते हैं जो अपने लिए नहीं, बल्कि दूसरों के लिए जीते हैं। उनकी सोच में अपना लाभ नहीं, बल्कि सबका भला छिपा होता है। वे किसी के चेहरे पर मुस्कान लाने के लिए अपने हिस्से की खुशी भी त्याग देते हैं। लेकिन विडंबना यह है कि ऐसे लोगों को अक्सर सबसे अधिक गलत समझा जाता है। उन्हें सम्मान से पहले आलोचना मिलती है, प्रशंसा से पहले ताने सुनने पड़ते हैं। फिर भी वे रुकते नहीं, क्योंकि उनके भीतर “बुराई लेने का साहस” होता है। उनकी निर्भीकता ही उनकी पहचान होती है, उनका आत्मबल ही उनकी शक्ति I

हमने देखा है, बहुत सरल स्वभाव और संवेदनशील व्यक्तित्व उनकी हार्दिक विशालता का पहचान पत्र होता है। दूसरों का दर्द बिना कहे समझ लेने वाले लोग, जिनका मन किसी की परेशानी देखने मात्र से बेचैन हो उठता हो, ऐसे लोग मदद इसलिए नहीं करते कि लोग उनकी प्रसंशा करें, अपितु इसलिए करते हैं क्योंकि उनका दिल इंसानियत से भरा होता है। वे जानते हैं कि अच्छाई का रास्ता आसान नहीं होता, फिर भी उसी राह पर चलते हैं। भाव और संवेदनाओं से सुसज्जित व्यक्तित्व ही बुराई सहन करने, उसे अंगीकार करने का साहस रख सकता है I

हमारे सम्बन्ध

दूर जाने की जरुरत नहीं, अपने आसपास ही, अपने घर में ही ऐसे विशालतम व्य्वाक्तित्व आपको मिल जायेंगे, इसमें समबन्ध की बात नहीं, कई बार आपके दादा में, दादी में, पिता-माता में, भाई बहन, जीजा अथवा बुआ आदि किसी में भी आपको वो स्वरुप मिल जायेगा, जिस तरह के व्यक्तित्व की बात हम कर रहे हैं I पति अपनी पत्नी से अपनी संतान और सम्बन्धियों के सामने गलियां खा रहा होता है, कि उसका आदमी उसे पैसे नहीं देता, लेकिन पैसे उसी ने दिए होते हैं और खूब सारे दिए होते हैं, घर के सब काम वही कर रहा होता है, सभी रिश्ते निभाते हुए, अपनी नौकरी सम्बन्धी कम भी बखूबी निभा रहा होता है, लेकिन कई बार देखा है ऐसे लोगों को भी पत्नियाँ सार्वजानिक रूप से कहते दिख जाएँगी ये कुछ नहीं करते I ऐसे ही भाई को नाकारा घोषित करने में बहन कमी नहीं छोड़ेगी, माँ बेटे को सबसे बड़ा कामचोर कहते हुए सुनाई देगी चाहे घर-बाहर के सारे कम उसी से करवाएं I

हमारे मित्र/सहकर्मी

जीवन में कई मित्र ऐसे आते हैं, जिनमें आपको अपनी सभी समस्याओं का समाधान दिख जायेगा, और उसमें भी ऐसे मित्र तो आपके अत्यंत प्रिय होते हैं जो आपकी हर बुराई लेने के लिए तैयार रहते हैं I आपके वर्किंग प्लेस पर भी आपको ऐसे पात्र मिल जायेंगे जो पूरे संस्थान का काम करते हैं, लेकिन उन्हें बुराई ही मिलती है, कुछ लोग अपनी बुराई सुनकर हताश-निराश हो जाते हैं और भाग खड़े होते हैं, किन्तु उनमें से ही कुछ लोग न केवल टिके रहते हैं अपितु हर परिस्थिति का सामना करते हैं और अपयश को हँसते हँसते अंगीकार करते हैं I मित्रो ऐसे लोग छोटे नहीं सच में बहुत बड़े होते हैं I वही आपके संस्थान, आपके उपक्रम के सच्चे सिपाही भी होते हैं और महान साधक भी I

दर्द सहकर भी साथ खड़े रहना

जो व्यक्ति सबकी सोचता हो ऐसे लोगों को अक्सर स्वार्थी लोग पसंद नहीं करते। क्योंकि सच्चाई कई बार लोगों की सुविधाओं के खिलाफ खड़ी हो जाती है। जब कोई व्यक्ति गलत बात का विरोध करता है, न्याय की बात करता है या किसी कमजोर का साथ देता है, तब बहुत से लोग उसे अपना विरोधी मान लेते हैं। उसकी नीयत पर सवाल उठाए जाते हैं, उसके चरित्र पर उंगलियाँ उठाई जाती हैं। लेकिन वह व्यक्ति चुपचाप सब सह लेता है, क्योंकि उसे अपने कर्मों पर विश्वास होता है। ऐसे लोग भीतर से बहुत मजबूत होते हैं। वे टूटते जरूर हैं, पर बिखरते नहीं। कई बार रातों में अकेले रोते हैं, क्योंकि जिन लोगों के लिए उन्होंने अपना सब कुछ दिया, वही लोग उन्हें गलत समझ लेते हैं। फिर भी अगले दिन वे उसी मुस्कान के साथ किसी और की मदद करने निकल पड़ते हैं। यही उनकी सबसे बड़ी खूबी होती है, दर्द सहकर भी दूसरों को राहत देना।

निश्वार्थ प्रेम ही देगा साहस

बुराई लेने का साहस” हर किसी में नहीं होता। इसके लिए विशाल ह्रदय चाहिए, धैर्य चाहिए और सबसे अधिक चाहिए निस्वार्थ प्रेम। जो व्यक्ति समाज की भलाई के लिए अपनी छवि तक दांव पर लगा दे, वही सच्चा इंसान कहलाने योग्य होता है। इतिहास गवाह है कि दुनिया बदलने वाले अधिकांश लोगों को पहले आलोचना और अपमान ही मिला था। लेकिन समय ने अंततः उनकी अच्छाई को स्वीकार किया।

आज के समय में ऐसे लोगों की बहुत जरूरत है, जो बिना किसी स्वार्थ के दूसरों के लिए खड़े हो सकें। जो नफरत के बीच प्रेम बाँट सकें, जो आलोचनाओं के बीच भी अच्छाई का रास्ता न छोड़ें। क्योंकि अंत में इंसान की पहचान उसके शब्दों से नहीं, बल्कि उसके त्याग और उसके साहस से होती है।

अंततः सफल कौन ?

छल-कपट, दिखावा और चमचागिरी करने वाले लोग आपको चलते हुए नहीं अपितु दौड़ते हुए दिखाई तो देंगे, लेकिन कहीं पहुँच नहीं पाएंगे ! और धीमा, शांत और सहज चलने वाला मनुष्य आपको शायद दिखे कहीं नहीं, लेकिन लक्ष्य तक पहुंचेगा वही I अपने निर्मल में से सबका भला सोचकर काम करने वाला व्यक्ति और उसमें भी ऐसा व्यक्ति जो अपमान, निंदा सहन करते हुए भी मनोयोग से धैर्यपूर्वक अपने कर्तव्यबोध के साथ अपने काम में लगा रहता है,वही पूज्य होता है I

 लोग पत्थर फेंकते रहे, वो रास्ता बनाता रहा , हर बुराई को चुपचाप सीने से लगाता रहा।

लेखक: प्रमोद कुमार
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