प्रमोद कुमार
संस्थानों में उत्कृष्ट कार्य-संस्कृति के क्षरण एवं उसके समाधान पर एक प्रमोद कुमार के विचार
किसी भी संस्था की वास्तविक शक्ति उसके भवन, संसाधनों, तकनीक या नियमों में नहीं होती, बल्कि उन लोगों में होती है जो उसके उद्देश्य को अपना उद्देश्य मानकर काम करते हैं। इतिहास में जिन संस्थानों ने असाधारण उपलब्धियां प्राप्त की हैं, उनके पीछे ऐसे लोगों की लंबी श्रृंखला रही है, जिन्होंने पद से अधिक दायित्व को महत्व दिया और व्यक्तिगत लाभ से अधिक सामूहिक उद्देश्य के प्रति समर्पण दिखाया।
समर्पण की कद्र नहीं-सम्मान का भाव नहीं
आज हमारे सामाजिक और संस्थागत जीवन में एक चिंताजनक प्रवृत्ति दिखाई देती है। लोग किसी उद्देश्य, संस्था या नेतृत्व के प्रति पूरे मन से समर्पित होकर काम करने से पहले यह देखने लगे हैं कि मुझे इससे क्या मिलेगा? मेरे योगदान की कितनी चर्चा होगी? मुझे कितना अधिकार मिलेगा? और मेरे ऊपर कौन है? दूसरी ओर, नेतृत्व में भी अपने साथ काम करने वालों के समर्पण को पहचानने, उसका सम्मान करने और उनके विकास की जिम्मेदारी लेने की प्रवृत्ति कमजोर होती जा रही है। समस्या केवल यह नहीं है कि कर्मचारी या कार्यकर्ता समर्पण से काम नहीं कर रहे। उससे बड़ी समस्या यह है कि समर्पण को सम्मान और संरक्षण देने वाली संस्कृति भी कमजोर पड़ रही है।
किसी व्यक्ति से वर्षों तक निष्ठा और अतिरिक्त प्रयास की अपेक्षा की जाए, लेकिन उसके योगदान को सामान्य मान लिया जाए, तो धीरे-धीरे उसके भीतर का उत्साह समाप्त होता है। वह काम तो करता है, लेकिन उत्कृष्टता के लिए आवश्यक वह अतिरिक्त ऊर्जा नहीं लगाता। यही वह अंतर है जो ‘काम पूरा करने’ और ‘उत्कृष्ट काम करने’ के बीच होता है।
पद दायित्व क्यों समझो ?
नेतृत्व की जिम्मेदारी केवल आदेश देना नहीं है। एक अच्छा नेतृत्व अपने अधीन काम करने वाली टीम के प्रति भी समर्पित होता है। वह केवल परिणाम का श्रेय लेने के लिए नहीं, बल्कि कठिन समय में टीम के साथ खड़े होने, गलतियों में मार्गदर्शन देने और सफलता में दूसरों को आगे करने के लिए होता है।
समर्पण एकतरफा व्यवस्था नहीं हो सकता। यदि संस्था अपने लोगों से समर्पण चाहती है तो उसे भी अपने लोगों के प्रति समर्पित होना पड़ेगा। आज कई संस्थानों में एक और समस्या बढ़ रही है—व्यक्ति को उसके परिणाम से अधिक उसके पद से देखा जाना। इससे टीम में प्रतिस्पर्धा तो बढ़ती है, लेकिन सहयोग घटता है। लोग एक-दूसरे को आगे बढ़ाने के बजाय स्वयं आगे निकलने की चिंता करने लगते हैं। परिणामस्वरूप संस्था में प्रतिभाएं तो रहती हैं, लेकिन सामूहिक उत्कृष्टता पैदा नहीं हो पाती।
समाधान से बदलेगी तस्वीर ?
सबसे पहले संस्थानों को ‘काम के बदले वेतन‘ की मानसिकता से आगे बढ़कर ‘उद्देश्य के लिए योगदान‘ की संस्कृति विकसित करनी होगी। इसका अर्थ यह नहीं कि आर्थिक हित महत्वहीन हैं, अपितु यह है, कि व्यक्ति को अपने काम के व्यापक उद्देश्य से जोड़ा जाए।
इसका दूसरा पहलू यह भी है, कि योगदान की सार्वजनिक और व्यक्तिगत दोनों स्तरों पर पहचान हो। हर पुरस्कार बड़ा होना आवश्यक नहीं है। कभी-कभी एक वरिष्ठ का यह कहना कि—“तुमने कठिन समय में संस्था के लिए जो किया, उसे मैं भूला नहीं हूं”– किसी व्यक्ति के भीतर वर्षों तक ऊर्जा पैदा कर सकता है।
हमारा नेतृत्व भी अपनी टीम के प्रति उत्तरदायी बने। जो व्यक्ति अपने अधीनस्थों के विकास, सम्मान और कठिन समय में उनके साथ खड़े होने को अपनी जिम्मेदारी समझता है, वही वास्तविक नेतृत्व संस्कृति विकसित करता है। साथ ही संस्थाओं में ‘श्रेय साझा करने‘ की परंपरा विकसित हो। सफलता का श्रेय ऊपर बैठे व्यक्ति तक सीमित न रहे। जिस व्यक्ति ने पर्दे के पीछे काम किया, उसे भी सामने लाया जाए। इससे लोगों को यह विश्वास मिलता है कि संस्था उनके योगदान को देखती और समझती है।
परिणाम से ज्यादा पहल जरुरी
केवल परिणाम नहीं, बल्कि कार्य के पीछे की निष्ठा और प्रक्रिया को भी महत्व दिया जाए। हर बार परिणाम अपेक्षित नहीं हो सकता, लेकिन ईमानदार प्रयास, सीखने की क्षमता और संस्था के प्रति जिम्मेदारी को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। अंततः हमें यह समझना होगा कि उत्कृष्ट संस्थान केवल कुशल लोगों से नहीं बनते, बल्कि एक-दूसरे के प्रति समर्पित लोगों से बनते हैं।
जिस संस्था में वरिष्ठ कनिष्ठ के विकास के लिए समर्पित हो, कनिष्ठ संस्था के उद्देश्य के लिए समर्पित हो, सहकर्मी एक-दूसरे की सफलता के लिए सहयोगी हों और नेतृत्व समर्पित लोगों को सम्मान देता हो—वहां उत्कृष्टता स्वाभाविक रूप से जन्म लेती है।
समर्पण की सीमाओं को पर करना होगा !
आज आवश्यकता लोगों से अधिक काम लेने की नहीं, बल्कि उनमें यह विश्वास पैदा करने की है कि उनका काम महत्वपूर्ण है, उनका योगदान दिखाई देता है और उनके समर्पण का सम्मान होता है।
क्योंकि जिस दिन व्यक्ति को यह अनुभव होने लगे कि संस्था उसके समर्पण को समझती है, उसी दिन वह केवल अपने कर्तव्य की सीमा तक नहीं, बल्कि अपनी क्षमता की सीमा तक काम करना शुरू कर देता है। संस्थाएं आदेशों से चल सकती हैं, लेकिन उत्कृष्ट संस्थाएं समर्पण से बनती हैं।

