
सुविधा कहती है जब मेरे पास समय हो, तब तुम मुझसे बात करो। संवेदना कहती है जब तुम्हें मेरी जरूरत हो, मैं अपनी व्यस्तता में से भी तुम्हारे लिए थोड़ा समय निकालूँगा। सुविधा कहती है मेरा मूड खराब है, इसलिए मुझे अकेला छोड़ दो। संवेदना कहती है तुम्हारा मूड खराब है, मैं तुम्हें परेशान नहीं करूँगा, लेकिन तुम्हें यह एहसास जरूर रहेगा कि मैं तुम्हारे साथ हूँ। सुविधा कहती है मुझे जब प्यार चाहिए, तब तुम मेरे करीब रहो। संवेदना कहती है तुम्हें जब प्यार और अपनापन चाहिए, तब मैं तुम्हारी जरूरत को समझने की कोशिश करूँगा- भले ही उस समय मेरी अपनी जरूरत कुछ और हो। सुविधा में, रिश्ता हमारी परिस्थितियों के अनुसार चलता है। संवेदना में हम कभी-कभी रिश्ते के लिए अपनी परिस्थितियों से थोड़ा समझौता करते हैं।
दोनों के मध्य मूल विरोध क्या ?
लेकिन संवेदना का अर्थ यह नहीं कि व्यक्ति अपनी सारी सीमाएँ समाप्त कर दे या हर समय उपलब्ध रहे। स्वस्थ संवेदना का अर्थ है- अपनी सुविधा और सामने वाले की जरूरत के बीच संतुलन बनाना। यदि कोई व्यक्ति हमेशा केवल अपनी सुविधा देखता है, तो रिश्ता धीरे-धीरे एकतरफा हो जाता है। और यदि कोई व्यक्ति केवल सामने वाले की जरूरतों में ही स्वयं को समाप्त कर दे, तो वह भी स्वस्थ संबंध नहीं है।
इसलिए मेरा मानना है,कि “सुविधा में हम चाहते हैं कि दूसरा व्यक्ति हमें समझे; संवेदना में हम कोशिश करते हैं कि पहले हम दूसरे व्यक्ति को समझें।” और शायद रिश्तों की सबसे बड़ी खूबसूरती भी यही है—जहाँ ‘मेरी जरूरत’ और ‘तुम्हारी जरूरत’ के बीच ‘हमारी संवेदना’ जन्म लेती है, वही एक दूसरे के प्रति सच्ची संवेदना है ।
प्रेम की नई अवधारणा
“यदि तुम मुझे मेरी सुविधा के अनुसार प्यार नहीं करते, मेरी जरूरत के समय मेरे साथ नहीं होते, मेरी भावनाओं को तुरंत प्राथमिकता नहीं देते, तो तुम इस संबंध को लेकर गंभीर नहीं हो।” जैसे प्रेम का प्रमाण यही हो कि सामने वाला हर परिस्थिति में हमारी इच्छाओं के अनुसार स्वयं को ढालता रहे।
लेकिन क्या यही प्रेम है?
किसी भी युगल का सच्चा अर्थ केवल यह नहीं कि दो लोग एक-दूसरे से भावनात्मक अपेक्षाएँ रखें। प्रेम का वास्तविक अर्थ तो यह है कि दो स्वतंत्र व्यक्तित्व एक-दूसरे को समझने, स्वीकार करने और सम्मान देने का प्रयास करें। यदि संबंध में केवल एक व्यक्ति की भावना, सुविधा, समय और जरूरत सर्वोपरि हो जाए, तो वह प्रेम का संतुलित रूप नहीं रह जाता, वह धीरे-धीरे अपेक्षाओं का संबंध बन जाता है।
किसी प्रेम संबंध में यह कहना स्वाभाविक है कि “मुझे तुम्हारी जरूरत है।” लेकिन इसके साथ यह समझना भी जरूरी है कि सामने वाला हर क्षण हमारी जरूरत के अनुसार उपलब्ध नहीं हो सकता। उसकी अपनी जिम्मेदारियाँ, प्राथमिकताएँ, मनःस्थिति, व्यस्तताएँ और व्यक्तिगत सीमाएँ भी हैं।
प्रेम जिम्मेदारी का अधिकार जरुर देता है !
प्रेम किसी व्यक्ति को अपना बना लेने का शायद अधिकार नहीं देता लेकिन प्रेम उसे समझने की जिम्मेदारी जरूर देता है। कई बार हम कहते हैं- “अगर वह सच में मुझसे प्यार करता है तो मेरे लिए समय निकालेगा।” बात सही भी हो सकती है, लेकिन अधूरी है। प्रेम में समय देना महत्वपूर्ण है, पर हर समय उपलब्ध रहना प्रेम की अनिवार्य शर्त नहीं। उसी तरह किसी का व्यस्त होना यह प्रमाण नहीं कि उसके मन में प्रेम कम हो गया है।
सच्चा प्रेम उस समय दिखाई देता है जब दोनों व्यक्ति एक-दूसरे की परिस्थितियों को समझने का प्रयास करते हैं। कभी मैं उपलब्ध रहूँ, कभी तुम, कभी तुम्हें मेरी जरूरत हो तो मैं तुम्हारे साथ खड़ा रहूँ और कभी मुझे तुम्हारे सहयोग की आवश्यकता हो तो तुम मेरा हाथ थामो। यही पारस्परिकता प्रेम को संबंध बनाती है।
प्रेमी युगल का समबन्ध दो ऐसे लोगों से नहीं है जो हर समय एक-दूसरे से जुड़े रहें। इसका अर्थ दो ऐसे लोगों से है जो दूरी, व्यस्तता और अलग-अलग परिस्थितियों के बावजूद अपने संबंध की गरिमा बनाए रखें।
सिर्फ मेरा चश्मा ठीक है !
यह भी समझना होगा कि “मेरी भावना महत्वपूर्ण है” और “केवल मेरी भावना महत्वपूर्ण है”- इन दोनों बातों में बहुत बड़ा अंतर है।
आपकी भावना महत्वपूर्ण है, लेकिन सामने वाले की भावना भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। आपकी जरूरत वास्तविक है, लेकिन उसकी जरूरत भी वास्तविक हो सकती है। आपका समय मूल्यवान है, लेकिन उसका समय भी उतना ही मूल्यवान है। इसलिए यदि कोई व्यक्ति यह कहता है कि “तुम मेरी सुविधा के अनुसार नहीं चलते, इसलिए तुम गंभीर नहीं हो”, तो शायद उसे प्रेम को सुविधा की कसौटी पर नहीं, संवेदना और पारस्परिक सम्मान की कसौटी पर देखना चाहिए।
प्रेम में कभी-कभी अपनी इच्छा को पीछे रखना पड़ता है, लेकिन हमेशा नहीं। कभी सामने वाले को समझना पड़ता है, कभी स्वयं को समझाना पड़ता है। कभी साथ बैठना जरूरी होता है और कभी एक-दूसरे को थोड़ा निजी समय देना भी प्रेम का ही हिस्सा होता है।
सच्चा प्रेम वह नहीं जिसमें दो लोग एक-दूसरे से हर समय अपनी अपेक्षाएँ पूरी करवाते रहें, सच्चा प्रेम वह है जिसमें दोनों एक-दूसरे की अपूर्णताओं, सीमाओं और परिस्थितियों को समझते हुए साथ चलने का प्रयास करें।
क्योंकि प्रेम का सबसे सुंदर रूप अधिकार में नहीं, विश्वास में है, हर समय साथ रहने में नहीं, जरूरत के समय साथ होने में है; अपनी बात मनवाने में नहीं, एक-दूसरे की बात समझने में है।
“तुम मेरे हो, इसलिए मेरी सुविधा के अनुसार चलो” नहीं है। इसका अर्थ है—“तुम मेरे जीवन में महत्वपूर्ण हो, इसलिए तुम्हारी खुशी, तुम्हारी स्वतंत्रता, तुम्हारी भावनाएँ और तुम्हारी जरूरतें भी मेरे लिए मायने रखती हैं।” यही अंतर प्रेम और स्वामित्व में है। यही अंतर अपेक्षा और संवेदना में है। और शायद यही अंतर किसी संबंध को केवल रिश्ता नहीं, बल्कि सच्चा प्रेम बनाता है।
लेखक – (प्रमोद कुमार)
