रिश्ते चाहिए, अपनी सुविधा के अनुसार

आज के समय में प्यार शायद पहले से अधिक दिखाई देता है, लेकिन महसूस कम होता है। रिश्ते पहले से अधिक हैं, बातचीत के साधन पहले से अधिक हैं, एक-दूसरे तक पहुँचने की सुविधाएँ पहले से अधिक हैं, लेकिन फिर भी मनुष्य के भीतर अकेलापन बढ़ता जा रहा है। इसकी एक बड़ी वजह यह है कि आज हम प्यार भी अपनी सुविधा के अनुसार चाहते हैं।

असल में लोग चाहते हैं, कि हमें ऐसा व्यक्ति चाहिए जो जब हमें प्यार की जरूरत हो, तब प्यार करे; जब हमें साथ चाहिए, तब हमारे साथ रहे, जब हमारे पास समय हो, तब हमारे लिए उपलब्ध रहे। लेकिन जब सामने वाले को हमारी जरूरत हो, तब परिस्थितियाँ बदल जाती हैं। जब सामने वाला इसके मायने बदल कर देखता है, उसे चाहिए सबकुछ, वो सबकुछ या या यूँ कहें जब आप अपने अनुसार चाहते हो, इसी अनुसार सामने वाला भी तो चाहता होगा, ऐसे में कभी हम व्यस्त होते हैं, कभी हमारा मूड नहीं होता, कभी हमारे पास समय नहीं होता और कभी हमें लगता है कि सामने वाला हमारी स्वतंत्रता में हस्तक्षेप कर रहा है। और हम अपनी परिस्थितयों का रोना रो देते हैं तो कभी हम उलझते दिखें तो विक्टिम कार्ड खेलते नजर आते हैं I

दरअसल, आधुनिक रिश्तों की सबसे बड़ी समस्या शायद यही है कि हम संबंध तो चाहते हैं, लेकिन संबंधों की जिम्मेदारी नहीं। हम चाहते हैं कि सामने वाला हमारी भावनाओं को समझे, हमारी चुप्पी को पढ़े, हमारी व्यस्तता को स्वीकार करे और हमारी परेशानियों में हमारे साथ खड़ा रहे। लेकिन क्या हम भी उतनी ही गंभीरता से उसकी भावनाओं, उसकी जरूरतों और उसके अकेलेपन को समझने के लिए तैयार हैं?

समबन्धों की : सुविधा संस्कृति

प्यार केवल यह नहीं है कि जब मेरा मन करे तब तुम मेरे पास रहो। प्यार यह भी है कि जब तुम्हारा मन भारी हो, तब मैं तुम्हारे पास बैठ सकूँ।

आज रिश्तों में एक अजीब तरह की ‘सुविधा संस्कृति’ विकसित हो गई है। हम चाहते हैं कि सामने वाला हमेशा उपलब्ध रहे, लेकिन हमारी उपलब्धता हमारी सुविधा पर निर्भर हो। हमें बात करनी हो तो फोन तुरंत उठना चाहिए, लेकिन सामने वाला फोन करे तो हम कह देते हैं—“अभी व्यस्त हूँ।” हमें अकेलापन महसूस हो तो घंटों बातचीत चाहिए, लेकिन जब सामने वाला अपने मन की बात करना चाहे तो हमें लगता है कि वह परेशान कर रहा है। कई बार तो रिश्ते भी मोबाइल की नोटिफिकेशन की तरह हो गए हैं—जरूरत पड़ी तो खोल लिया, मन नहीं हुआ तो अनदेखा कर दिया।

यह व्यवहार केवल प्रेम संबंधों तक सीमित नहीं है। दोस्ती, पारिवारिक रिश्ते और सामाजिक संबंध भी इससे प्रभावित हो रहे हैं। हम चाहते हैं कि हमारे रिश्ते हमारे जीवन में जगह बनाए रखें, लेकिन हम अपने जीवन में उनके लिए जगह बनाने को तैयार नहीं होते।

सम्बन्ध संवेदनशीलता मांगता है !

रिश्ता समय माँगता है, ध्यान माँगता है और सबसे अधिक संवेदनशीलता माँगता है। किसी व्यक्ति को केवल इसलिए अपने जीवन में रखना कि वह हमारी जरूरत के समय हमारे काम आ सके, प्यार नहीं है। यह सुविधा हो सकती है। प्यार में ‘तुम मेरे लिए क्या कर सकते हो’ से अधिक महत्वपूर्ण सवाल होता है—मैं तुम्हारे लिए क्या कर सकता हूँ?’

सच्चे संबंधों में हिसाब-किताब नहीं होता। वहाँ यह नहीं देखा जाता कि मैंने तुम्हें कितनी बार फोन किया और तुमने मुझे कितनी बार किया। वहाँ यह भी नहीं गिना जाता कि किसने पहले संदेश भेजा। वहाँ महत्वपूर्ण यह होता है कि जब वास्तव में जरूरत थी, तब कौन खड़ा था।

लेकिन इसका दूसरा पहलू भी समझना जरूरी है। प्यार का अर्थ यह भी नहीं कि व्यक्ति हर समय उपलब्ध रहे। हर किसी की अपनी व्यस्तताएँ, सीमाएँ, निजी समय और व्यक्तिगत जरूरतें होती हैं। स्वस्थ रिश्ता वह है जहाँ दोनों व्यक्ति एक-दूसरे की स्वतंत्रता का सम्मान करते हुए एक-दूसरे की भावनात्मक जरूरतों को भी समझें।

समझदारी सिर्फ सामने वाले से ही क्यों चाहिए ?

समस्या तब पैदा होती है जब हम अपने लिए समझदारी और सामने वाले के लिए अपेक्षा रखते हैं। हम चाहते हैं कि वह हमारी मजबूरियाँ समझे, लेकिन उसकी मजबूरियाँ हमें दिखाई नहीं देतीं। हम अपनी चुप्पी को ‘थकान’ कहते हैं और उसकी चुप्पी को ‘बेरुखी’। अपनी व्यस्तता को ‘जरूरत’ और उसकी व्यस्तता को ‘उपेक्षा’ मान लेते हैं।

शायद हमें प्यार की परिभाषा को थोड़ा बदलने की जरूरत है। प्यार केवल उन खूबसूरत पलों का नाम नहीं है जब दोनों के पास समय हो, मूड अच्छा हो और परिस्थितियाँ अनुकूल हों। प्यार की असली परीक्षा उन दिनों में होती है जब समय कम हो, मन परेशान हो, जीवन उलझा हुआ हो और फिर भी हम एक-दूसरे के लिए थोड़ी-सी जगह बना पाते हों। कभी-कभी सामने वाले को समाधान नहीं चाहिए होता, केवल यह एहसास चाहिए होता है कि मैं अकेला नहीं हूँ, कोई है जो मेरी बात सुनने के लिए मौजूद है।”

सम्बन्ध के सूत्र

रिश्ते बड़े-बड़े वादों से नहीं, छोटी-छोटी संवेदनशीलताओं से मजबूत होते हैं- एक फोन, एक संदेश, थोड़ी देर सुन लेना, बिना पूछे हाल समझ लेना और कभी-कभी अपनी सुविधा से बाहर निकलकर किसी के लिए उपलब्ध हो जाना। आखिरकार, प्यार वह नहीं जो केवल हमारी जरूरत के समय हमें मिल जाए। प्यार वह है जिसमें हम सामने वाले की जरूरत को भी उतनी ही गंभीरता से महसूस करें, जितनी अपनी।

रिश्ते सुविधा से नहीं, संवेदना से चलते हैं। जहाँ केवल “मुझे क्या चाहिए” बचा रह जाए, वहाँ प्यार धीरे-धीरे समाप्त होकर केवल अपेक्षा बन जाता है। किसी को अपने जीवन में रखना है तो केवल अपनी जरूरत के लिए नहीं, उसकी जरूरतों के लिए भी जगह रखिए। क्योंकि प्यार पाने की इच्छा जितनी स्वाभाविक है, उतना ही जरूरी है किसी के लिए प्यार बनकर रहना।

लेखक – (प्रमोद कुमार)

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