परिचय-
हम सभी ने सुना होगा कि “मन के हारे हार है, मन के जीते जीत” है I अर्थात हार-जीत का महत्व जितना व्यवहारिक जीवन में है, उससे कहीं ज्यादा आपके मन के स्तर पर महसूस करने का सम्बन्ध है I बहुत से लोगों को यह कहते हुए सुना होगा कि हम करना तो चाहते हैं लेकिन मन नहीं मानता I आप दो ऐसे लोगों का विश्लेषण करिए एक तो वह जो अपनी कामयाबी के शिखर पर पहुँच गया और एक वह जो अपनी जिंदगी के गर्त में पहुंचा चुका है I इन दोनों में एक बात सूत्रधार के रूप में मिलेगी वो ये जिसने अपने मन को अपने अधीन कर लिए वो शिखर पर पहुँच गया और जो स्वयं मन के आधीन हो गया वो अपनी जिंदगी के सबसे निचले पायदान पर पहुँच गया I उत्थान और पतन की बड़ी खाई के मध्य यदि कुछ है तो वो है आपका “मन” I
आप सभी ने बहुतायत में यह कहते हुए भी सुना होगा कि मन बहुत चंचल है, और हम आपको यह समझाना चाहते हैं, कि बात मात्र मन की चंचलता भर की नहीं है, अपितु उसकी टेज चाल और उसके द्वारा गलत बातों को ज्यादा पकड़ने के स्वभाव को भी हमें समझना पड़ेगा I सबसे टेज गति से दौड़ने वाला यह मन जितना आपको अवनति के लिए खींचता है, उससे भी तेज गति से यह आपकी उन्नति के काम भी आ सकता है I आपको करना मात्र यह होगा इसे अपने हिसाब से चलाना होगा, इसपर सवार होकर इसे अपने संकल्पों के अनुसार हांकना होगा और यह संभव है अभ्यास के माध्यम से, आपके विवेक और आपकी दूरदृष्टि का प्रयोग करने से सब संभव है I
मन को अपने संकल्प के अनुसार पक्का और परिपक्व बनाने के लिए इच्छाशक्ति को अनुशासित अभ्यास में बदलना सबसे ज़रूरी कदम आपको उठाने होंगे । जब मन में बार-बार ‘संकल्प-विकल्प’ (द्वंद्व) चलता है, तो वह कमज़ोर होने लगता है। अपने मन की संकल्प शक्ति को अभेद्य और परिपक्व बनाने के लिए आपको कुछ व्यवहारिक और मनोवैज्ञानिक रणनीति अपनानी होगी I
छोटे-छोटे संकल्पों से शुरुआत करें
शुरुआत में बहुत बड़े संकल्प लेने के बजाय छोटे और निश्चित संकल्प लें। जैसे-“मैं रोज़ केवल 15 मिनट किताब पढ़ूँगा” या “सुबह 5 बजे उठूँगा”। जब आप छोटे-छोटे संकल्पों को पूरा करते हैं, तो आपके अवचेतन मन का खुद पर भरोसा बढ़ता है। इससे बड़ा संकल्प लेने की आंतरिक परिपक्वता आती है। जो सोचा था वो काम नहीं बना, उसके कारण मन छोटा न करने की बजाय वह घटना आपको बहुत कुछ सिखाने आयी थी यह सोचकर उसपर से ध्यान हटा कर, और मजबूती से अगले कम पर अपना ध्यान केन्द्रित कर देना चाहिए I
वैकल्पिक प्लान तैयार रखें
प्रलोभन या आलस आने पर मन तुरंत संकल्प तोड़ देता है। इसके लिए पहले से एक मानसिक नियम तैयार रखें। उदाहरण के लिए “यदि दोपहर में मुझे सोशल मीडिया चलाने का मन करेगा, तब मैं तुरंत 5 मिनट के लिए गहरी सांसें लूंगा या टहलने चला जाऊंगा।” यह रणनीति मन को भटकने से रोकती है। मन करता है कि इस बार मुझे बी-टेक में प्रवेश ले ही लेना है, किन्तु किसी कारणवश यदि आपका सम्बंधित कोर्स में प्रवेश नहीं हो पाता है तो आप वैकल्पिक कोर्स सोच कर रखें तब आपको घबराहट नहीं होगी आयर यह भी सोचें कि नियति ने आपके लिए वो नहीं यह सोच कर रखा था और जो हो रहा है वही सत्य है I
साक्षी भाव को आत्मसात करें
जब भी मन संकल्प से पीछे हटने के बहाने बनाए, तो उस पर गुस्सा होने के बजाय एक दर्शक की तरह देखें। प्रतिदिन 10 से 15 मिनट का ध्यान या मौन अभ्यास मन की चंचलता को शांत करता है और उसे एक दिशा में एकाग्र करने की शक्ति देता है। सोचिये अच्छा, प्रगतिशील सोच के साथ आगे भी बढिए, किन्तु यह भी ध्यान रखिये जो हम सोचते हैं वैसा ही हो जाये यह संभव नहीं, इसलिए आगे बढिए, जो हो रहा है उसे साक्षी भाव से देखिये, सफलता मिले तो दंभ मत करिए और नाकामयाबी मिले तो हताश मत होइए बिलकुल भी, सहज रहिये I
तत्काल या दूरगामी लाभ
यह ध्यान रखें एक अपरिपक्व मन तुरंत मिलने वाले मजे जैसे- जंक फूड खाना या रील्स देखना, मजे करने का सोचना आदि के पीछे भागता है। परिपक्व मन दूर के फायदे को देखता है। जब भी संकल्प डगमगाए, खुद से पूछें—”यह कदम मुझे मेरे लक्ष्य के करीब ले जाएगा या दूर?” आज सोचा और कल हो जाये, या फिर चुटकी बजाई और सब हो ही जाये ऐसा होता नहीं, ऐसा होगा यह भी संभव नहीं, आज चाहे कष्ट मिलें, किन्तु हम जो सोच रहे हैं, जिस उद्देश्य को लेकर काम कर रहे हैं उनका आज लाभ हो न हो लेकिन इसके परिणाम अच्छे आयें इसी संकल्प के साथ आगे बढ़ना होगा I
अपने आत्मानुशासन पर बल दीजिये
संकल्प को सिर्फ एक काम मत मानिए, बल्कि उसे अपनी पहचान बना लीजिए। अपने संकल्प को इतना आत्मसात कर लीजिये कि वह आपकी पहचान बन जाये I और अपनी पहचान को स्थापित रखने के लिए आत्मानुशासन का सहारा लीजिये I यह कहने के बजाय कि “मैं सुबह उठने की कोशिश कर रहा हूँ”, खुद से कहें—”मैं एक अनुशासित व्यक्ति हूँ मुझे सुबह जल्दी उठाना ही है।” जब आप खुद को एक परिपक्व व्यक्ति के रूप में देखना शुरू करते हैं, तो मन उसी के अनुसार व्यवहार करने लगेगा।
अपने को माफ़ करने का स्वभाव
यदि किसी दिन आपका संकल्प टूट भी जाए, तो आत्म-ग्लानि या हीन भावना में न डूबें अपराध बोध से बचें। परिपक्व मन अपनी गलती स्वीकार करता है और बिना समय गंवाए अगले ही पल से दोबारा अपने नियम पर लौट आता है। मन रातों-रात पक्का नहीं होता। यह एक मानसिक मांसपेशी की तरह है, जिसे आप रोज़ थोड़ा-थोड़ा अनुशासित करके ही मजबूत और अडिग बना सकते हैं। आपका आत्मबल आपकी परिपक्वता की पहचान है, आपका मन भी उसी अनुरूप काम करता है I अतः जब जब भी आपसे से कोई गलती हो जाये या आपके साथ कोई आपकी अपेक्षा के विपरीत व्यवहार कर जाये तो भी, आपसे हुई जाने अनजाने गलती को आप सहज भाव में माफ़ करने का स्वभाव अपने में विकसित करें I
लेखक
(प्रमोद कुमार)
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