प्रमोद कुमार

समय बदल रहा है। समाज बदल रहा है। लोगों की प्राथमिकताएँ बदल रही हैं और उनके साथ रिश्तों को देखने का नजरिया भी बदलता जा रहा है। कभी संबंध जीवन की पूंजी हुआ करते थे, आज कई बार वे सफलता की सीढ़ी बनते दिखाई देते हैं। जिन लोगों के साथ हमने जीवन के कठिन दिनों में खड़े होकर उनका साथ दिया, जिनके लिए अपने समय, संसाधन और प्रभाव का उपयोग किया, वही लोग कभी-कभी अवसर मिलते ही हमें पीछे छोड़कर आगे निकल जाने में संकोच नहीं करते।

सम्बन्ध होते तार तार

दुख इस बात का नहीं कि कोई व्यक्ति आगे बढ़ गया। दूसरों की प्रगति से भला किसे आपत्ति हो सकती है? पीड़ा तब होती है, जब किसी की सफलता की नींव में आपके विश्वास, सहयोग और संबंधों का योगदान हो, लेकिन मंजिल पर पहुंचते ही वह व्यक्ति उन्हीं संबंधों को भूल जाए। और इससे भी अधिक पीड़ा तब होती है, जब वह आगे बढ़ने के लिए आपको ही पीछे धकेल दे।

आज निजी स्वार्थ ने संबंधों की परिभाषा को कहीं-कहीं बहुत संकीर्ण कर दिया है। जब तक किसी रिश्ते से लाभ मिल रहा है, तब तक अपनापन दिखाई देता है। फोन आते हैं, संदेश आते हैं, मुलाकातें होती हैं, आत्मीयता का प्रदर्शन होता है। लेकिन जैसे ही उद्देश्य पूरा हो जाता है, वही संबंध धीरे-धीरे औपचारिकता में बदल जाता है। कभी-कभी तो व्यक्ति उस इंसान को ही अपने रास्ते की बाधा मानने लगता है, जिसने उसके लिए रास्ता बनाया था।

बाहरी नहीं अपने ही तोड़ते हैं !

सबसे अधिक चोट तब लगती है जब यह व्यवहार किसी बाहरी व्यक्ति से नहीं, बल्कि अपने ही लोगों से मिलता है। बाहर वाले से मिले धोखे को मन किसी तरह स्वीकार कर लेता है, लेकिन अपने व्यक्ति का बदल जाना भीतर तक तोड़ देता है। क्योंकि अपने लोगों से हम लाभ की अपेक्षा नहीं, विश्वास की अपेक्षा रखते हैं।

रिश्ते तभी रिश्ते होते हैं, जब उनमें केवल उपयोग नहीं, उत्तरदायित्व भी हो। किसी के संपर्क, प्रभाव, पहचान या सामर्थ्य का उपयोग करके आगे बढ़ जाना अपने आप में गलत नहीं है, यदि उसमें कृतज्ञता और संवेदनशीलता बनी रहे। समस्या तब पैदा होती है जब व्यक्ति संबंध को केवल एक साधन मान लेता है और सामने वाले मनुष्य को भूल जाता है।

उपयोगिता की तराजू

आज समाज में एक विचित्र प्रवृत्ति दिखाई देती है—लोग रिश्तों को निभाने से अधिक उन्हें प्रबंधित करने लगे हैं। कौन कितना उपयोगी है, किससे कितना लाभ मिल सकता है, किससे संपर्क भविष्य में काम आएगा—इन प्रश्नों ने कई बार आत्मीयता की जगह ले ली है। परिणाम यह है कि हमारे पास संपर्कों की लंबी सूची तो है, लेकिन भरोसा करने योग्य लोगों की संख्या कम होती जा रही है।

आपदा में अवसर

लेकिन हर छल के बाद स्वयं को कठोर बना लेना भी समाधान नहीं है। किसी ने हमारे विश्वास का गलत उपयोग किया, इसका अर्थ यह नहीं कि दुनिया में विश्वास करने योग्य लोग समाप्त हो गए। किसी ने संबंध तोड़ा, इसका अर्थ यह नहीं कि संबंधों का मूल्य ही समाप्त हो गया। आवश्यकता केवल इतनी है कि प्रेम के साथ विवेक भी हो और विश्वास के साथ सीमाएँ भी।

जीवन में ऐसे लोगों की पहचान करना जरूरी है जो आपके साथ तब भी खड़े रहें, जब आपको देने के लिए उनके पास कोई लाभ न हो। जो आपकी अनुपस्थिति में भी आपका सम्मान करें। जो आपकी सफलता से असुरक्षित न हों। और जो आगे बढ़ते समय आपको पीछे छोड़ने के बजाय आपके साथ चलने का प्रयास करें।

अनजाने में मूल्यवान को न खोएं

क्योंकि असली सफलता केवल यह नहीं कि आप कितनी ऊंचाई तक पहुंचे। असली सफलता यह भी है कि उस ऊंचाई तक पहुंचते समय आपने कितने रिश्तों को बचाकर रखा। आपने कितने लोगों का हाथ थामा और कितनों का हाथ रास्ते में छोड़ दिया।

समय किसी को भी हमेशा एक जैसा नहीं रखता। आज जिसके पास शक्ति है, कल उसे सहारे की आवश्यकता हो सकती है। आज जिसे हम पीछे छोड़कर आगे निकल रहे हैं, संभव है कल वही व्यक्ति हमारे जीवन में सबसे महत्वपूर्ण साबित हो। इसलिए संबंधों को स्वार्थ की कसौटी पर तौलने से पहले एक बार यह अवश्य सोचना चाहिए कि कहीं हम अपनी सुविधा के लिए अपने ही जीवन की सबसे मूल्यवान पूंजी तो नष्ट नहीं कर रहे।

हाथ थामने वाले को कभी न भूलें

आखिरकार पद, पैसा, प्रतिष्ठा और उपलब्धियां जीवन को सुविधाजनक बना सकती हैं, लेकिन मन को सुकून रिश्ते ही देते हैं। रास्ते में आगे निकल जाना बड़ी बात नहीं है, बड़ी बात यह है कि आगे बढ़ते हुए भी हम उन लोगों को न भूलें, जिन्होंने कभी हमारा हाथ पकड़कर हमें चलना सिखाया था।

किसी को पीछे छोड़कर आगे बढ़ना उपलब्धि हो सकती है, लेकिन किसी का हाथ थामकर आगे बढ़ना ही इंसानियत है।

लेखक : आध्यात्मिक उत्प्रेरक हैं I

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