प्रमोद कुमार
जिंदगी कभी कभी एक चौराहे पर खड़ी जैसी लगती है, तो कभी कभी बहु मार्गों का झुण्ड खड़ा दिखता है तो कभी कभी एक भी रास्ता दिखाई नहीं देता I हम सभी जानते हैं, सुनते हैं, कि यदि हम सफलता हेतु हमारे जीवन में उपलब्ध अनेकों रास्तों पर भटकने के बजाय एक रास्ते पर मनोयोग से चलना ही असली सामर्थ्य है I जीवन में कामयाबी पाने के रास्ते अनेक हो सकते हैं। कोई ज्ञान के मार्ग से आगे बढ़ता है, कोई व्यवसाय से, कोई कला से, कोई सामाजिक सेवा से और कोई अपनी प्रतिभा तथा नेतृत्व क्षमता के बल पर अपनी पहचान बनाता है। समस्या रास्तों की कमी नहीं है, समस्या यह है कि हम एक रास्ता चुनने के बाद उस पर टिक नहीं पाते। हम अक्सर सफल लोगों की कहानियां सुनते हैं। महात्मा गांधी से लेकर ए. पी. जे. अब्दुल कलाम तक, धीरूभाई अंबानी से लेकर अनेक वैज्ञानिकों, कलाकारों, खिलाड़ियों और उद्यमियों तक—उनकी जीवन-यात्रा में एक बात समान दिखाई देती है: उन्होंने अपनी ऊर्जा को किसी एक उद्देश्य की दिशा में लगातार लगाया।
लेकिन हममें से बहुत से लोग शुरुआत करने से पहले ही दूसरे विकल्प तलाशने लगते हैं। परिणाम यह होता है कि प्रयास तो बहुत होते हैं, लेकिन उपलब्धि अपेक्षित नहीं मिलती। किन्तु हम आत्ममंथन, मनोविज्ञान और व्यवहारिक जीवन-प्रबंधन करते हुए एक सफलतम व्यक्तित्व बन सकते हैं I
दुविधा ही सबसे बड़ी बाधा है
आज हमारे सामने विकल्प पहले से कहीं अधिक हैं। इंटरनेट ने अवसरों की दुनिया खोल दी है। हर दिन कोई नया करियर, नया व्यवसाय, नई तकनीक या नई सफलता की कहानी सामने आती है। इससे प्रेरणा मिलने के साथ-साथ तुलना भी बढ़ती है। हम सोचते हैं—यह रास्ता बेहतर है या वह? कहीं मैं गलत दिशा में तो नहीं जा रहा? दूसरे लोग मुझसे आगे तो नहीं निकल रहे?
हमारे मन में चल रहा निरंतर संशय हमारी गति को कमजोर करता है। जिस मन में हर समय विकल्प बदलने की इच्छा हो, उसमें किसी एक लक्ष्य के लिए गहराई से काम करने की क्षमता विकसित नहीं हो पाती।
पहला सामर्थ्य !
हमें अपने आप में निर्णय लेने की क्षमता विकसित करनी होगी ही, सफलता की यात्रा का पहला पड़ाव है—निर्णय ही है। हर रास्ता सही हो सकता है, लेकिन हर रास्ता हमारे लिए सही नहीं हो सकता। इसलिए अपनी रुचि, क्षमता, संसाधन और परिस्थितियों का ईमानदारी से आकलन करके एक दिशा चुननी होगी। निर्णय का अर्थ यह नहीं कि आगे कभी बदलाव नहीं किया जा सकता। इसका अर्थ है कि बदलाव विवेक से हो, बेचैनी से नहीं।
दूसरा सामर्थ्य !
लक्ष्य चुन लेना आसान है, उसके साथ लगातार बने रहना कठिन होता है, इसलिए अगला सूत्र है एकाग्रता । यहाँ हमें यह भी समझना होगा कि एकाग्रता का अर्थ केवल घंटों काम करना नहीं है। इसका अर्थ है—जब हम काम कर रहे हों तो हमारा मन उसी काम में उपस्थित रहे, हमारा समर्पण मन,बुद्धि और विवेक द्वारा हमारा उपाधान हमारे द्वारा निश्चित मार्ग से हटना नहीं चाहिए। जैसे हम मोबाइल, सोशल मीडिया, अनावश्यक चर्चाएं, दूसरों की उपलब्धियों से तुलना और बार-बार दिशा बदलने की आदत हमारी मानसिक ऊर्जा को बांट रही होती है। इसलिए यद् रखिये बिखरी हुई ऊर्जा से बड़े परिणाम पैदा नहीं होते।
तीसरा सामर्थ्य !
आज की सबसे बड़ी मानसिक चुनौती है—तुरंत परिणाम की अपेक्षा, लोगों में धैर्य का आभाव स्पष्ट दिखाई पड़ता है। देखा गया है, हम कुछ सप्ताह मेहनत करके परिणाम न मिलने पर मान लेते हैं कि शायद रास्ता गलत है। जबकि वास्तविकता यह है कि अधिकांश बड़ी उपलब्धियां समय, अभ्यास और निरंतरता मांगती हैं। बीज बोने के बाद रोज मिट्टी खोदकर यह देखना कि पौधा कितना बढ़ा, विकास की प्रक्रिया नहीं है। कुछ चीजों को समय देना पड़ता है।
चौथा सामर्थ्य !
प्रेरणा हमेशा साथ नहीं रहती। कुछ दिन उत्साह होगा, कुछ दिन थकान होगी, कुछ दिन असफलता मिलेगी और कुछ दिन मन बिल्कुल नहीं करेगा। हमारे द्वारा तय किये मार्ग पर यदि मनोयोग से रूचि पूर्वक चलना चाहते हैं तो आपको अनुशासन वृति अपने अन्दर विकसित करनी होगी I और यही अनुशासन एक अस्त्र की तरह काम आएगा । जब मन कहे—आज नहीं, तब भी आवश्यक काम कर पाना ही अनुशासन है। उसी समय मन को कमांड देनी होती है I जो व्यक्ति अपने समय, नींद, प्राथमिकताओं, ध्यान और दैनिक दिनचर्या को नियंत्रित करना सीख लेता है, वह धीरे-धीरे अपने जीवन की दिशा को भी नियंत्रित करने लगता है।
कौन-सी कमियां हैं दुश्मन ?
अपने लक्ष्य के प्रति एकाग्र होने से पहले हमें स्वयं के भीतर झांकना होगा। क्या हम निर्णय लेने में कमजोर हैं? क्या हमें दूसरों की स्वीकृति की आवश्यकता अधिक है? क्या हम आलोचना से जल्दी विचलित हो जाते हैं? क्या हम असफलता से डरते हैं? क्या हम तुलना में अपना समय गंवाते हैं? क्या हम काम शुरू तो करते हैं, लेकिन पूरा करने से पहले नया काम पकड़ लेते हैं? हम क्यों दृढ नहीं हो पाते इस पर विचार करना होगा I
आत्ममंथन अस्त्र है !
कमियों को छिपाने के बजाय पहचानना होगा। क्योंकि जिस कमजोरी का हमें पता ही नहीं, उसे दूर कैसे करेंगे?
एकाग्रता का अर्थ अवसरों को ठुकराना नहीं, प्राथमिकता तय करना है, जीवन में अनेक अवसर आएंगे। हर अवसर को पकड़ लेना बुद्धिमानी नहीं है। कभी-कभी सफलता इस बात में होती है कि हम जानते हैं—किस अवसर को छोड़ना है।
इसलिए एक लक्ष्य चुनिए, उसे छोटे-छोटे चरणों में बांटिए। प्रतिदिन थोड़ा आगे बढ़िए। अपनी प्रगति को दूसरों से नहीं, अपने कल से मापिए। धीरे-धीरे वही छोटा प्रयास सामर्थ्य में बदलने लगेगा।
व्यक्तित्व निर्माण बनेगी सीढ़ी
अंततः कामयाबी केवल मंज़िल तक पहुंचने का नाम नहीं है। उस यात्रा में हमारा व्यक्तित्व कितना मजबूत हुआ, यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है। यह सच है, कि निर्णय हमें दिशा देता है, एकाग्रता गति देती है, अनुशासन निरंतरता देता है, धैर्य हमें टिकाए रखता है और आत्ममंथन हमें गलतियों से सीखना सिखाता है।
इसलिए जीवन में एक रास्ता चुनिए, चाहे रास्ता हो या व्यक्ति उस पर मनोयोग से चलिए, उसे संभाल कर रखिये I बीच-बीच में स्वयं को सुधारते रहिए, हो सकता है मंज़िल तक पहुंचने में अपेक्षा से अधिक समय लगे, रास्ते में बाधाएं आएं और कई बार स्वयं पर संदेह भी हो। लेकिन यदि दिशा स्पष्ट है, प्रयास ईमानदार है और कदम निरंतर हैं, तो यात्रा व्यर्थ नहीं जाती। क्योंकि कामयाब लोग हमेशा अलग रास्ते नहीं चुनते—अक्सर वे चुने हुए रास्ते पर दूसरों से अधिक देर तक चलते रहते हैं।
(लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं)

