परिचय-

जीवन में असंतुष्ट होना हमेशा गलत के लिए नहीं होता, आप सभी भी होते हैं, आपका उद्देश्य पावन एवं बड़ा होते हुए भी, आपकी सोच सकारात्मक पर भी हो सकता है यह आपमें असंतुष्टि का कारण बने I

संतोषी सदा सुखी यह बात तो सत्य है, साथ ही क्या यह अवधारणा सही है कि असंतुष्ट हमेशा दुखी ही रहता है ! आपको यह जानकर आश्चर्य होता आपको असंतुष्टि भी ताकत देती है, आपको असंतिष्टि हमेशा संघर्ष की, संकल्प को पाने की उर्जा देती है, क्योंकि मनुष्य में असंतुष्टि हमेशा नकारत्मक ही नहीं होती, आपकी असंतुष्टि भी सकारात्मक हो सकती है, इसे हमें दो भागों में विभाजित किया है इसमें से प्रथम है आपका ज्ञान और अनुभव, एवं दूसरा है आप में अति महत्वाकांक्षा आयी असंतिष्टि , अब यह आपको सोचना है कि आप कौन सी असंतुष्टि से पीड़ित हैं?

आपका ज्ञान और अनुभव

जब हम अपनी सोच और अपने लक्ष्य के अनुसार अपने आसपास के वातावरण, अपने से जुड़े लोगों, समाज के लोगों की सोच और उनके व्यवहार को देखते हैं l और उनके साथ ही आपको काम करना पड़े, सभी साथ लेकर या उनके मध्य तो आपकी कार्यपद्धति, आपकी सोच और चीजों को समझने और उनके विवेकपूर्ण निस्तारण की आपकी विधि निश्चित रूप से एक सामान्य जन से अलग होगी l ऐसी परिस्थिति में आपका असंतुष्ट होना स्वाभाविक है l अच्छी बात यह है कि आप अच्छा करने के लिए असंतुष्ट हैं, ना कि निजी कारणों एवं अपने अहंकार के कारण l

अब इसे और गहनता से समझते हैं तो समझ आता है, कि जैसा आप सोच रहे होते हैं वैसा लोग नहीं सोचते, न उस प्रकार से, न उतने स्तर पर जाकर, असल में उनकी दृष्टि इतनी विशाल नहीं होती, दूरगामी सोच के अभाव में, कार्यकुशलता की कमी के कारण, एक विवेकशील प्राणी को व्यवस्था एवं निकटवर्ती लोगों के स्वभाव, व्यवहार से असंतुष्ट होना स्वाभाविक है l

सकारात्मक असंतुष्टि

जो अपनी, या व्यवस्था की, आत्मकल्याण के लिए, जन कलायन के लिए, सामुदायिक उत्थान के लिए, आपकी सोच, आवश्यता के विपरीत, बेहतरी के लिए किये जाने वाले कार्यों के प्रति सामान्यतः लोग प्रगतिशील सोच के साथ नहीं विचार करते और कर्म करते हैं, इसलिए सब कुछ को देखते हुए बहुत से लोग दुखी अथवा असंतुष्टि को प्राप्त होते हैं I उनका सोचना,विचारना बेहतरी के लिए होता है,किन्तु लोग समझते नहीं हैं, न उसकी भावना और न उसकी प्राथमिकता अतः इसी के करण वह अच्छा करने के उद्देश्य के अनुसार हॉट नहीं दिखता तो कभी कभी प्रगतिशील व्यक्ति में भी असंतुष्टि का भाव जागृत हो जाता है I

दिशाहीनता बड़ा कारण

हम सकारत्मक भी हैं, हमारा ज्ञान, अनुभव, योग्यता एवं हमारी क्षमता भी आवश्यकता के अनुरूप होती है, किन्तु हम सही दिशा में आगे नहीं बढ़ रहे होते हैं I क्योंकि हमारी जानकारियां अधिक होती हैं, हमारी क्षमता के अनुरूप लक्ष्य और सोच भी बड़ी होती है, किन्तु सब कुछ देखते, सुनते और अनुभव करते हुए भी हम एकाग्र होकर नहीं चल पाते इसलिए दिशाहीन रह जाते हैं I सबकुछ है किन्तु हमारे व्यक्तित्व में परिपक्वता नहीं और न ही तटस्थता है, इसलिए जो अच्छा अच्छा दिखता या विचार में आता है वो सब कुछ करने का मन होता है, इसलिए जो करना चाहिए वह न करके कुछ और ही करने लगते हैं I करते सब कुछ अच्छा हैं, किन्तु जीवन की कुशल रणनीति का आभाव एवं एकाग्रता न होने के कारण करते भी चलते हैं और छूटता भी जाता है I

अपनी कल्पनाओं के आधार क्रियान्वयन

आपका विचार, आपकी सोच, आपकी भावना एवं आपकी दिशा के अनुरूप विषयों का क्रियान्वयन नहीं होता तो आप असंतुष्ट होने लगते हैं I आप अन्दर से कम बाहरी कारणों से असंतुष्ट ज्यादा होने लगते हैं, इसलिए आपके चेहरे पर, आपके व्यवहार में आपके स्वभाव में उसका असर दिखने लगता है, एवं इससे आगे इसके दुष्प्रभाव भी आपके व्यक्तित्व पर स्पष्ट दिखाई पड़ने लगते हैं I इसलिए जब भी आप जो भी सोचें, योजना बनायें उसमें सबसे प्रमुखता से सोचें कि इसकी व्यवहारिकता क्या है I कैसे आपके विचार को, आपकी योजना को मूर्त रूप दिया जा सकता है, उसे साकार करने में आपके साथ लगी टीम उसके लिए पात्र हैं क्या ? आपके अनुभव,विचार और दिशा के अनुरूप उनकी सोच और स्वभाव हैं कि नहीं I सभी प्रकार से सुनिश्चित होकर ही आगे बढ़ें I यह जीवन अत्यंत दुर्लभ है, इसमें जीवन्तता होना जरुरी है, इसलिए जो कर रहे हैं, उसमें जीवन्तता है कि नहीं, और उस मार्ग पर चलते चलते आप उस श्रम और सोच का आनंद ले रहे हैं, कि नहीं यह जरुर विचार लें I

आपकी अति महत्वाकांक्षा

यह मनुष्य की व्यक्तित्व की कमजोरी से पैदा होने वाली असंतुष्टि यही है I मनुष्य की इच्छाएँ अनंत होती हैं। एक इच्छा पूरी होते ही दूसरी जन्म ले लेती है। यही अंतहीन चाह असंतोष को जन्म देती है। सब कुछ अपने अनुसार ही, आत्मकेंद्रित मनुष्यों में यह बहुतायत में पायी जाती है I इसके कारण वह अपयश को भी प्राप्त होते हैं एवं अनेकों प्रकार से दुखी भी रहते हैं I ऐसा हो सकता है कुछ लोग आपको आगे बढ़ते दिखें, उनकी जिंदगी और पहचान चमचमाती दिखें किन्तु यह भी सच है, कि उनकी यात्रा लम्बी नहीं होती और किसी भी लक्ष्य को प्राप्त कर सकती I बाहर से चमचमाता चेहरा भीतर से टूटन से भरा होता है ऐसी प्रजाती का I यह अलग है समाज में ऐसे लोग बढ़ते जा रहे हैं, लेकिन जिनकी जड़ें गहरी हैं, जो लोग मजबूत व्यक्तित्व के धनी हैं वह अति महत्वाकांक्षी नहीं होने, वो लेने की कम देने की अवधारणा पर काम करते हैं I

सुख को धन से नहीं खरीद सकते 

दूसरों की सफलता, धन, पद या सुख देखकर स्वयं की तुलना करने से भी अपने मन में असंतुष्टि का बीज अंकुरित होता है। दूसरों से तुलना करने से व्यक्ति अपने पास की अच्छाइयों को भूल जाता है। आप देखेंगे आवश्यकता से कुछ लोगों में अधिक पाने की इच्छा मन को कभी शांत नहीं रहने देती। अपने आप में लालच जितना बढाओगे, आपमें संतोष उतना घटता दिखाई देगा । जब व्यक्ति स्वयं को श्रेष्ठ सिद्ध करना चाहता है और अपेक्षित सम्मान नहीं मिलता, तब उसके भीतर असंतोष पैदा होता है। लगातार सफलता पाने की चिंता और असफलता का डर मन को बेचैन बनाए रखता है। आज का मनुष्य तुरंत परिणाम चाहता है, किन्तु न प्रतीक्षा करना चाहता और संघर्ष कर पाने का साहस उसमें दिखाई नहीं देता, इसलिए जल्द ही उसमें निराशा और असंतोष बढ़ने लगता है। जो उपलब्ध है उसका मूल्य न समझकर केवल अभावों पर ध्यान देना भी असंतुष्टि को बढ़ाता है। सुख को केवल धन, वस्तुओं और बाहरी उपलब्धियों में ढूँढना स्थायी संतोष नहीं दे पाता।  क्रोध, ईर्ष्या, द्वेष और चिंता जैसी नकारात्मक भावनाएँ मन को अस्थिर रखती हैं।

आध्यात्मिकता का आभाव

हम बारीकी से देखेंगे तो समझ में आएगा कि जीवन का उद्देश्य, आत्मचिंतन और आध्यात्मिक मूल्यों से दूर होने पर व्यक्ति भीतर से खाली महसूस करता है। उसकी जीवन दृष्टि बड़ी नहीं हो पाती, आपके विचार सामान्य रहते हैं I आपका आत्मविश्वास भी कम रहता है I दूसरों को सहन करने की शक्ति का आभाव दिखायी पड़ता है I जब तक आपको आध्यात्मिक जुडाव और भाव नहीं है, तब तक आप मजबूती से असंतुष्टि के वेग को सहन नहीं कर पाएंगे एवं कुछ भी आपके मन के अनुरूप न होने पर आपको जीवन में असंतुष्टि बढती जाएगी I इसलिए आपका जीवन में आध्यात्मिक जुडाव होना अत्यंत आवश्यक है I छोटे बड़े असंतुष्टि के वार को सहन करने, बार बार सहन करने के लिए आपमें आध्यात्मिक जागरण अत्यंत जरुरी है I

असंतुष्टि से संतुष्टि की ओर

हमें यह बहुत ही गहराई से समझना होगा कि असंतुष्टि हमेशा गलत के लिए नहीं होती, वह सकारात्मक भी हो सकती है I अच्छे के लिए भी असंतुष्टि मनुष्य में हो सकती है, जब आप अपने जीवन में कुछ भी अच्छा करना चाहेंगे तब-तब हो सकता है आपके आसपास से आपको अपेक्षानुरूप सहयोग न मिल सके, यहीं से होता है असंतुष्टि का प्रारंभ I यह आपमें पैदा हुआ असंतोष आपका व्यक्तिगत दुर्गुण बने उससे पूर्व इसे प्रारंभ में ही रोकना होगा, इसके लिए हमें असंतुष्टि से संतुष्टि की ओर मजबूती से बढ़ना होगा I

संतोष बाहरी परिस्थितियों से अधिक मन की अवस्था है। इच्छाओं पर संयम, कृतज्ञता, आत्मचिंतन और सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाकर मनुष्य असंतुष्टि को कम कर सकता है। भारतीय दर्शन में कहा गया है, संतोषं परमं सुखम् अर्थात संतोष ही सबसे बड़ा सुख है। आपमें संतुष्टि बढ़ेगी जब जब आपका व्यक्तित्व बड़ा होगा, आपमें आत्मविश्वास स्तम्भ खड़ा होगा I अपने कर्म और व्यव्हार में कोई अंतर नहीं होगा I आपके दृढ निश्चय और पावन उद्देश्य से आपको आपके तय लक्ष्य प्राप्त होने लगेंगे और आप संतुष्टि की ओर बढ़ने लगेंगे I

लेखक

(प्रमोद कुमार)

https://motivationtoall.com/

info.motivationtoall@gmail.com

 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *