हम अपने आसपास भी अनेकों ऐसे लोग देखते हैं, भावनात्मक रूप से बहुत नाजुक होते हैं, एवं कई लोग भावनात्मक रूप से असुरक्षित भी होते हैं I भावनात्मक होना एवं भावनात्मक असुरक्षित होना दोनों में पृथ्वी आकाश जैसा अंतर है, कई लोग इन्हें जोड़कर देखते हैं |
किन्तु यह हमें स्पष्ट रूप से समझना होगा, कि भावनात्मक असुरक्षा एक ऐसी मानसिक अवस्था है जिसमें व्यक्ति अपने विचारों, भावनाओं, संबंधों, या अस्तित्व को लेकर अस्थिर, डर और संदेह से ग्रसित होता है।
यदि आप शारीरिक रूप से पुष्ट भी हैं और भावनात्मक रूप असुरक्षित हैं तो आपको पूर्ण स्वस्थ नहीं कहा जा सकता I क्योंकि यह अवस्था आपको कुछ भी करने नहीं देगी, अथवा यह कहें कि आपको वह सब करने नहीं देगी, जो आपको करना चाहिए, भावजगत में जायेंगे तो कहना होगा कि जिसके लिए आपका जन्म इस धराधाम पर हुआ है, वो सब आप कर ही नहीं पाते हैं,आपके व्यक्तित्व में बैठी यह असुरक्षा आपको अन्दर बाहर से तोड़ देती है I
प्राय देखा गया है, कि यह असुरक्षा अक्सर लोगों में आत्म-सम्मान की कमी, पिछले नकारात्मक अनुभवों, या बचपन की उपेक्षा जैसे कारणों से विकसित होती है।
आपकी आत्मिक कमजोरी के कारण भी आपको भावनात्मक असुरक्षा हो सकती है I अपने व्यक्तित्व में परिपक्वता का न होना, अध्यात्मिक अज्ञानता, लोक व्यवहार की अनुभवहीनता, अपने जीवन में सेवा, त्याग और सत्य का आभाव ऐसे अनेकों कारणों से आप भावनात्मक असुरक्षा का शिकार हो सकते हैं I
भावनात्मक असुरक्षा के लक्षण क्या हैं :-
स्वयं पर, अपने रिश्ते पर या दूसरों की नीयत पर, हर बात पर शक करना, दूसरों से लगातार सराहना या मान्यता की आवश्यकता महसूस करना। अस्वीकृति का डर अर्थात आलोचना या रिजेक्शन से बहुत अधिक डर लगना। यदि आप ईर्ष्या और तुलना करते हैं, स्वयं की तुलना दूसरों से करना एवं दूसरों से जलन महसूस करना।
स्वयं को छोटा महसूस करना अर्थात यह सोचना कि आप दूसरों से कमतर हैं या आपके अंदर कोई “खामी” है, एवं हर स्थिति को ज़रूरत से ज़्यादा सोचना I यह सब बातें यदि हम किसी में अथवा स्वयं में देखते हैं, महसूस करते हैं तो समझ लीजिये आप भावनात्मक असुरक्षा के शिकार हैं I
भावनात्मक असुरक्षा किन कारणों से होती है :
जब जब भी आपको भावनात्मक असुरक्षा होगी तब शायद आपको पता भी न चले, क्योंकि मामला शरीर का नहीं मन का है, जो दिखता नहीं, प्रारंभ में समझ में भी नहीं आता, क्योंकि आप तो इसी वहम में रहते हैं. कि आप तो सर्वथा सही ही हैं |
आपके अनुभव, आपके आसपास के लोगों का व्यव्हार और उनकी जिंदगी, आपके निकर्वर्ती लोगों का स्वभाव,उनके जीवन में घटित हुए घटनाएँ एवं आपके जीवन में पूर्व में हुई घटनाएँ, आदि अनेकों कारणों एवं परिस्थितियों के कारण आप भावनात्मक असुरक्षा का शिकार हो सकते हैं, उनमें से प्रमुख हैं, यदि किसी ने बचपन में भावनात्मक उपेक्षा या अत्यधिक आलोचनाएँ सही हों, किसी के जीवन में उनके अटूट रिश्तों का टूटना या विश्वासघात होना, व्यक्ति में आत्म-सम्मान की कमी होना, आप अपने आपकी या परिवार की तुलना और अपेक्षाएं करना, आपके जीवन में हुआ कोई ट्रॉमा या आपसे लगातार किया गया दुर्व्यवहार I
यह सभी प्रमुख कारणों से मनुष्य भावनात्मक असुरक्षा का शिकार होता है, और बढ़ता ही चला जाता है, जब तक उसे कोई योग्य साथ अथवा सलाह न मिल जाये उसके पश्चात् आता है उपचार, इसके उपचार में आपकी संकल्पशीलता, आपकी जीवन के प्रति चाह, आपका आत्मबल काम आता है I
कैसे बाहर आ सकते हैं भावनात्मक असुरक्षा से !
स्व-स्वीकृति (Self-Acceptance) :
अपने दोषों और खूबियों दोनों को अपनाइए, एवं इस श्रृष्टि में कोई भी पूर्ण नहीं होता, यह समझना जरूरी है। आप जैसे हैं, उसी रूप में आप महत्वपूर्ण हैं, प्रभु ने आपको उसी रूप में श्रृष्टि में भूमिका निभाने के लिए भेजा है I इसलिए आत्म गौरव करें, अपना और अपनी भावनाओं का सम्मान करें, अपना आदर करें I
आत्म-चिंतन (Self-reflection) :
असुरक्षा कब और क्यों होती है, उसे पहचानिए, एवं डायरी लिखना इसमें सहायक हो सकता है। आत्ममंथन करिए, आपके प्रश्नों के समाधान आपमें ही हैं, उन सभी का उत्तर आपमें ही है, कहीं बाहर ढूंढने से अच्छा है, आपके आत्ममंथन से निकला उत्तर ही मूल समाधान है और वही आपकी संतुष्टि का सार होगा I
सकारात्मक आत्म-वार्ता (Positive Self-talk) :
खुद को नीचे दिखाने वाली सोच को चुनौती दें। जैसे: “मैं किसी लायक नहीं हूँ”-“मैं सीख रहा हूँ और बेहतर हो रहा हूँ।” कहीं और से कम आपके अन्दर की सकारात्मकता को जगाइए अपने आपसे सकारात्मक बातें करिए, अपने गुणों का ध्यान करिए, आप कितनों से अच्छे हैं और मजबूत हैं I
सीमाएं तय करना (Setting Boundaries) :
ऐसे लोगों और स्थितियों से दूरी बनाएं जो आपकी असुरक्षा को बढ़ाते हैं। अनेकों लोग जाने अनजाने आपके जीवन में होते हैं, जो आपको हर समय असुरक्षित महसूस करवाते हैं, बात बात पर आपको यह अहसास करवाते हैं, जहाँ आपको यह लगने लगता है, आप इस दुनियां के सबसे बड़े असुरक्षित व्यक्ति हैं, आपका कोई अपना नहीं और न ही आपको कोई समझता है और न ही समय आने पर आपके साथ कोई खड़ा होगा I
सहायता लेना (Seek Help) :
आपको यदि कुछ भी समझ में न आये तो आप किसी काउंसलर या थैरेपिस्ट से बात कर सकते हैं, आप अपने दोस्तों या परिवारजनों से खुलकर संवाद करें। बहुत सी बातें जो आपके मन में बैठी हैं, जो आपको बहुत बड़ी भी लगती होंगी, लेकिन जब आप बाते करेंगे तो उनका सहज ही समाधान हो जायेगा, तब आपका आत्मविश्वास भी बढेगा,कि जिन बातों अथवा मुद्दों को आप इतना बड़ा समझ रहे थे, वो इतने बड़े हैं ही नहीं I और यदि कोई मुद्दा ऐसा है, जिसे आप नहीं कर पा रहे, किन्तु करना चाहते हैं तो क्या उसमें बाकी लोगों के मदद करने से कोई अच्छा मार्ग निकल सकता है I
माइंडफुलनेस और मेडिटेशन :
वर्तमान में जीने का अभ्यास असुरक्षा को घटाता है। एवं योग और ध्यान मददगार हो सकते हैं। अपनी प्रतिभा एवं ईश्वर आपने दिए गए गुणों और विलक्षणताओं को पहचानिए, कल में नहीं आज में और अभी में जीने की कला सीखिए, सहज रहिये और इस जहान में अपने होने पर गर्व करिए |
आप योग और ध्यान का सहारा लीजिये, अपने आपको अध्यात्मिक दर्शन से जोडिये, जब आप अपने आपको तर्क की कसौटी पर तोलेंगे तो आप अपने आपको बहुत बेहतर अवस्था में पाएंगे तभी आपका आत्मविश्वास बढेगा I
खुद को निखारें (Self-growth) :
नई चीज़ें सीखें, किताबें पढ़ें, कोई हॉबी अपनाएं एवं आत्मविश्वास बढ़ाने के लिए छोटे-छोटे लक्ष्य बनाकर उन्हें पूरा करें।
इससे आप अपने आप को निखार पाएंगे, आप अपने आपको बढाइये, अपने आपको खड़ा करिए, आप अपनी जिंदगी में कुछ बेहतर करना चाहते हैं, आप अपने अपनों के लिए बेहतर कुछ करना चाहते हैं, उसके लिए आपको स्वयं को सबल बनाना होगा और आप सबल हो सकते हैं, केवल खुद को निखारने मात्र से, इसलिए आप अपने आपको निखारें अपने आपको संवारें तभी आप अपने जीवन से न्याय कर पाएंगे |
यह बात ध्यान रखिये ! भावनात्मक असुरक्षा हर इंसान कभी न कभी महसूस करता है। यह कोई कमजोरी नहीं, बल्कि एक संकेत है कि अंदर कुछ ऐसा है जिसे सुनने और समझने की जरूरत है। जब आप इसे नजरअंदाज करने के बजाय समझने लगते हैं, तो आप उसे धीरे-धीरे पीछे छोड़ने लगते हैं।
लेखक: प्रमोद कुमार
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