जीवन में हर व्यक्ति चाहता है कि उसे कोई ऐसा साथी मिले, जो उसके सुख-दुःख में उसके साथ खड़ा रहे, उसकी भावनाओं को समझे, उसकी परेशानियों में उसका सहारा बने और जीवन की कठिन राहों पर उसका हाथ थामे रखे। लेकिन एक सच्चे और जीवनपर्यंत चलने वाले संबंध की शुरुआत केवल इस अपेक्षा से नहीं होती कि सामने वाला हमें कितना कुछ देगा। संबंध तब गहरा होता है, जब हम स्वयं भी यह सीखते हैं कि हमें सामने वाले को कितना देना है।

रिश्ता सौदा नहीं

वास्तव में, साथ पाने की पहली शर्त साथ देना है। केवल यह चाहना कि कोई हमें समझे, हमारी परवाह करे, हमारे लिए समय निकाले और हमारी भावनाओं को महत्व दे—पर स्वयं उसके लिए ऐसा करने को तैयार न होना, संबंध को धीरे-धीरे कमजोर कर देता है। रिश्ते किसी सौदे की तरह नहीं होते कि मैंने इतना दिया तो बदले में मुझे इतना मिलना चाहिए। रिश्तों की खूबसूरती तो इस बात में है कि दोनों व्यक्ति अपनी क्षमता और परिस्थिति के अनुसार एक-दूसरे के जीवन को बेहतर बनाने का प्रयास करते रहें।

दो जीवनसाथी जब एक-दूसरे से केवल लेने की अपेक्षा करते हैं, तब संबंध में हिसाब-किताब शुरू हो जाता है। किसने कितना समय दिया, किसने पहले फोन किया, किसने किसकी बात मानी, किसने किसके लिए कितना त्याग किया—ऐसे प्रश्न धीरे-धीरे प्रेम की सहजता को समाप्त कर देते हैं। इसके विपरीत, जब दोनों के मन में यह भावना होती है कि मैं तुम्हारे जीवन में क्या जोड़ सकता हूँ?”, तब संबंध अपेक्षाओं से ऊपर उठकर आत्मीयता का रूप ले लेता है।

चुप्पी समझनी होगी

जीवनसाथी का अर्थ केवल साथ रहने वाला व्यक्ति नहीं है। वह वह व्यक्ति है जिसके साथ हम अपने जीवन की जिम्मेदारियाँ, संघर्ष, सपने, असफलताएँ और सफलताएँ साझा करते हैं। इसलिए कभी उसे समय देना होगा, कभी उसकी चुप्पी समझनी होगी, कभी अपनी सुविधा छोड़कर उसकी आवश्यकता को प्राथमिकता देनी होगी और कभी अपनी बात सही होने के बावजूद संबंध की गरिमा के लिए थोड़ा झुकना होगा। यही छोटे-छोटे त्याग रिश्तों की बड़ी नींव बनाते हैं।

प्रेम का वास्तविक अर्थ हर समय एक-दूसरे से खुश रहना नहीं, बल्कि कठिन समय में भी एक-दूसरे के प्रति सम्मान बनाए रखना है। जीवन में परिस्थितियाँ बदलती हैं। कभी एक साथी मजबूत होता है तो कभी दूसरा। कभी एक आगे बढ़ता है तो कभी दूसरे को सहारे की आवश्यकता होती है। यदि दोनों यह समझ लें कि आज तुम्हारी जरूरत है, कल मेरी भी हो सकती है, तो संबंधों में प्रतिस्पर्धा के स्थान पर सहयोग जन्म लेता है।

संबंधों को जीवनपर्यंत चलाने के लिए प्रेम के साथ संवाद, विश्वास, सम्मान, धैर्य और देने की प्रवृत्ति आवश्यक है। साथ वही सुंदर होता है जिसमें दोनों एक-दूसरे का सहारा बनते हैं। जहाँ अधिकार के साथ जिम्मेदारी, अपेक्षा के साथ संवेदना और प्रेम के साथ समर्पण होता है। इसलिए यदि जीवन में किसी का सच्चा साथ चाहिए, तो सबसे पहले स्वयं उसका सच्चा साथी बनना सीखिए। क्योंकि रिश्ते केवल पाने से नहीं, बल्कि एक-दूसरे को लगातार कुछ देते रहने से बड़े होते हैं, और इसी भावना से वे जीवन की अंतिम साँस तक साथ चलने की ताकत पाते हैं।

साथ चाहिए तो साथ देना सीखो

प्रेम में हर कोई चाहता है कि कोई उसे समझे, उसके लिए समय निकाले, उसकी उदासी पढ़ ले, उसकी खामोशी सुन ले और जब दुनिया उसके विरुद्ध खड़ी हो जाए तो उसका हाथ थामकर कहे— मैं हूँ न, तुम अकेले नहीं हो।” लेकिन प्रेम का सबसे खूबसूरत सच शायद यह है कि जिस साथ की हम तलाश करते हैं, वही साथ हमें भी बनना पड़ता है।

जब एक थक जाता है तो दूसरा सहारा बनता है। जब एक टूटने लगता है तो दूसरा उसे संभालता है। जब एक अपने सपनों की ओर बढ़ता है तो दूसरा उसके रास्ते में दीवार नहीं, हौसला बनकर खड़ा होता है। प्रेम में कभी-कभी अपनी जिद छोड़नी पड़ती है। कभी अपनी पसंद से अधिक साथी की जरूरत को समझना पड़ता है। कभी मन में बहुत कुछ होते हुए भी पहले उसकी बात सुननी पड़ती है। और कभी यह स्वीकार करना पड़ता है कि संबंध में जीतना जरूरी नहीं, संबंध को बचाए रखना जरूरी है।

प्रेम की परिपक्वता

साथ का अर्थ हर समय साथ रहना भी नहीं है। कभी-कभी दूर रहकर भी किसी के लिए उपस्थित रहना प्रेम होता है। उसके व्यस्त होने को समझना, उसके मौन को सम्मान देना, उसकी असफलता पर उसका हाथ पकड़ना और उसकी सफलता में बिना किसी ईर्ष्या के सबसे ज्यादा खुश होना, यही प्रेम की परिपक्वता है।

दो लोग जब प्रेम में होते हैं तो वे एक-दूसरे से बहुत कुछ चाहते हैं। लेकिन प्रेम तब बड़ा होता है, जब चाहत के साथ देने की आदत भी पैदा होती है।

उसे समय दो, उसे सम्मान दो।
उसकी बात सुनो, उसकी भावनाओं को समझो।
उसके सपनों को अपना समझो।
उसकी कमजोरियों को हथियार मत बनाओ।
उसकी गलतियों को हमेशा याद रखकर उसे कटघरे में मत खड़ा करो।

सबसे जरूरी—उसे यह भरोसा दो कि परिस्थितियाँ चाहे जैसी हों, तुम्हारा साथ परिस्थितियों के साथ नहीं बदलेगा। क्योंकि कोई रिश्ता केवल खूबसूरत पलों की तस्वीरों से नहीं बनता। वह उन अनगिनत छोटे-छोटे क्षणों से बनता है, जब दोनों में से कोई एक चुपचाप दूसरे के लिए कुछ कर देता है और बदले में कुछ नहीं माँगता।

प्रेम निभाने की कला है

प्रेम में केवल यह मत सोचो कि तुम्हें कैसा साथी चाहिए। यह भी सोचो कि तुम्हारे प्रेम में रहने वाला व्यक्ति तुम्हारे साथ कैसा महसूस करता है।

यदि उसके साथ तुम्हें सुकून मिलता है, तो उसे भी तुम्हारे साथ सुकून मिलना चाहिए।
यदि तुम चाहते हो कि वह तुम्हारा हाथ थामे, तो तुम्हें भी उसके हाथ को थामे रखना होगा।
यदि तुम्हें उसका साथ जीवनभर चाहिए, तो तुम्हें भी उसके जीवन का ऐसा साथी बनना होगा, जिसे खोने का डर नहीं, बल्कि साथ होने का विश्वास मिले। प्रेम पाने की नहीं, निभाने की कला है।

 लेखक(प्रमोद कुमार)

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